Friday, September 23, 2011
हाय रे PhD
कभी लगता ही नहीं तू , शायद अगले साल भी ख़तम होगी
कोई दुखी सचमुच तो, टेबल, नोटबुक और मेरी कलम होगी
माथा घिस घिस तुझसे इश्क लगा बैठा, मानो फूटी करम होगी
हाय रे PhD , तुझे बताना था, तू सच्ची बेवफा सनम होगी II
तुझसे चिपक जाने से कोई विद्वान हो जाये, ये झूठी भरम होगी,
तुझसे बरसों से जो इकरार करे, कभी तीखी, तो कभी नरम होगी,
दोस्तों से तकरार तो, प्यार से इंकार भी तेरी खोखली धरम होगी,
हाय रे PhD , मुझे अंदाजा ना था, जो तू इतनी बेशरम होगी II
तू इतना डरा धमका मत, तू मुझे निगल सकती ये तेरी वहम होगी,
आधी गपट ली तेरी रोटी, रिजल्ट- अनालिसिस तेरी शरम होगी,
शुकून तो तब होगा मुझे, जब तेरे पन्नों से मेरी बिस्तर गरम होगी,
हाय रे PhD , याद रख, कबर पे तेरे एक दिन 'डॉक्टर' जनम होगी II
II
तेरी फितरत का मंजर इतना ख़राब, तू मुझे गले लगा नहीं पाती,
तेरी आरज़ू में खोट है, तू किसी को खुशियों से सजा नहीं पाती,
तू कमीनी, तू निर्लज्ज, तू निर्मम, तू ज़ालिम, तुझे दया नहीं आती,
हाय रे PhD , रात भर छेरती मुझे, क्या तुझे हया नहीं आती II
डिपार्टमेंट के रास्तों की, रोजाना हसीं तस्वीर सजायी नहीं जाती
सुपरवायजर के कमेंट्स की, पुलिंदो से तकदीर बनायीं नहीं जाती
लाइब्रेरी के सूखे दीवारों पर, अब और निशान खुदायी नहीं जाती
हाय रे PhD, ख्याल कर, तेरी और मेल-मालिश करायी नहीं जाती II
नाम में लगा है 'विद्यार्थी', चैन से खुले आम कभी यु रोयी नहीं जाती ,
बीच मजधार में छोड़ जाएँ कहाँ, मलिन पापी पांव धोयी नहीं जाती,
तुने इतना दर्द किया कि, कान्फ्रेन्स में भी अब दिल खोयी नहीं जाती
हाय रे PhD, पेपर्स कि बारिश में तुझे धकेल भिगोयी नहीं जाती II
III
जान लेगी क्या, तू इतना गुनाह तो मत कर,
माना तूफान बाकी है, तू आगाह तो मत कर,
हर बैठक में, तू जोखिम अथाह तो मत कर,
मुझे फेल करने की, तू अब सलाह तो मत कर,
जी लेने दे मुझे, निराशा से निकाह तो मत कर,
तू खट्टी है, बेवजह नमक से विवाह तो मत कर,
तेरे होठों में रस नहीं, यु गुमराह तो मत कर ,
ढेरों संग हमबिस्तर हुई, मुझे हताह तो मत कर
हाय रे PhD, तू मुझे इतना तो तबाह मत कर I
हाय रे PhD, तू मुझे इतना तो तबाह मत कर II
---------------------कौशल किशोर विद्यार्थी
Sunday, September 11, 2011
आतंक के साये में
खुदा की मेहरबानी समझो, महफूज हैं हम तबाही के ठिकानों से I
न जाने कब शिकार हो जायें, किसी अनजान नाइट्रेट के निशानों से,
वारदाती विधानों से, या फिर ब्रीफकेस में बंद चंद अरमानों से II
क्या आंसू कभी धुल पाता है, चौराहों पे चार तैनात जवानों से,
उच्च-स्तरीय अधिकारिक बैठक, बेतरतीब बेबुनियाद बहानों से I
क्या सच्चा मलहम लग पाता है,'जांच जारी है' के गूंगे बयानों से,
पूछताछ, हिरासत, नाकाबंदी, पुलिस के झुठलाये अभिमानों से II
चंद महीनों का सन्नाटा भी मुमकिन नहीं, 'लश्कर' के पैमानों से,
बेकसूर, बेजान, बिलखते घायलों और अधमरों के परिधानों से I
हताश आज हम सभी हैं, बमों की गूँज से, आतंक के दुकानों से,
अफरातफरी के सिलिसिलाओं से, कर्कश कहर के पायदानों से II
क्या हम सुरक्षित हो पाएंगे, पुख्ता इंतजाम का ढाढस बढाने से,
'डब्बों' पर अत्यंत गहरा, हर बार राष्ट्रीय राजकीय शोक जताने से I
कब तक बच पाएंगे प्रबंध को, घटना को बस दुर्भाग्यपूर्ण बताने से,
कफ़न में लिपटी लाश को शुकुन कहाँ, अज्ञात आशंका सजाने से II
धमाको को दायरा कभी छोटा नहीं होता, यु ही मुआयना कर जाने से,
संदिग्धों के स्केच जारी, हर सुराग पे इनामी घोषणा कर पाने से I
शायद कभी देश बदला है, बिन ज़िम्मेदारी बेमानी नीति लाने से,
आमूल परिवर्त्तन नहीं होता, करीबी अस्पताल का दौरा कर आने से II
सैकड़ों मौत से सरकार सुधरती नहीं,ना दिनदहाड़े दिल्ली दहल जाने से,
शायद बदलाव की बयार बहे, कभी एकबारगी हजारों के मारे जाने से I
और गुनाहगार के गिरेबान दिखे, केवल जबरदस्त जनविरोध आ पाने से,
तब तक हर रोज़ हर महीने, उपाय नहीं, आतंक के साये में जी पाने से II
-------------------------------------कौशल किशोर विद्यार्थी
Thursday, August 25, 2011
लोकतंत्र की अंगड़ाई
चाय नाश्ता के शोर में,अन्ना की गिरफ़्तारी का ऐलान हुआ,
पल ही पल में 'अनचाही' करतूतों से धरना अभियान हुआ I
सरकार के खिलाफ फिर जन भागेदारी का आह्वान हुआ,
बस चार घंटो बाद ही,बेशर्त 'रामलीला'का प्रावधान हुआ II
किसी ने जोर से गुर्राया -"अभी गतिरोध जारी है"
"सबसे ज्यादा बेईमान सिब्बल और तिवारी है" I
मानो सबको - भ्रस्टाचार मुक्ति की बेकरारी है,
क्या सचमुच करप्सन केवल सरकारी बीमारी है?
कहीं दुकाने बंद, तो कहीं नुक्कड़ नाटक का तड़का,
कहीं आत्मदाह, तो कहीं सरकार की अर्थी झोंका I
कहीं काली पट्टी, तो कहीं जनता का रुख भड़का ,
कहीं बैंड बाजा, तो कहीं कलमाड़ी का पुतला फूँका II
कहीं मशाल, कहीं हवन, तो कोई पूजा पाठ में अटका,
कहीं कारवां चला, तो कभी एकाद पियक्कड़ बहका I
शहर शहर स्पीकर सेट्स से गली चौराहा महका,
बातचीत का दौड़ अभी शुरू, टी वी का डब्बा कड़का II
(II)
आज इसे आम लोगों के हताशी की अभिव्यक्ति समझो,
अपने पांव कुल्हारी वाली कांग्रेसी विपत्ति समझो I
फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब की क्षणिक प्रशस्ति समझो,
ब्लेकमेल, गन प्वाईंट या संवैधानिक विरक्ति समझो II
संघी या अंकल सेम की ही विलायती उत्पत्ति समझो,
मिडल कलासी तमाशा या फिर नक्सली संगति समझो I
सत्ता के शान औ अहंकार को पछारती चुनौती समझो,
भीड़ भगदड़ में शिरकत, पर हिंसा में कटौती समझो II
तोड़ दो मरोड़ दो, मगर ये मसला मत एकलौती समझो,
आग आंधी ना बने, इस कशमकश को बेशकीमती समझो I
कमिटी बने या संसद बहस करे, मौकों की गिनती समझो,
जनता जागरूक है, जन विचार को ना बेइज्जती समझो II
(III)
कितना भी नकार लो, लोकपाल के विचारों का जनसंचार हुआ,
कहीं समर्थन में , कही विरोध में, कोई ना इस्तीफा स्वीकार हुआ I
चमक उठा है आज देश देखो , हर शाम मोमबत्ती का बाज़ार हुआ,
टोपी ले लो, तिरंगा ले लो, खादी का ढेरो सारा फिर कारोबार हुआ II
संबोधनों का, भाषणों का, आश्वाषणों का निरंतर व्यापर हुआ,
सिलसिला बैठकों का, मसौदा पे मसौदा धुआंधार तैयार हुआ I
अनशन में, प्रदर्शन में, सड़क पे, नहर पे, नारेबाजी दमदार हुआ,
पक्ष हो या विपक्ष हो, जबरदस्त आलोचनाओं का शिकार हुआ II
बौलीवुडी धरनार्थियों से, हड़ताली मुहीम जायकेदार हुआ,
हाथ में झंडा, इंटरनेट पे फोटो, किस्सा जरुर मज़ेदार हुआ I
अर्बन पिकनिक, सोसियल रॉक और पॉप निर्विकार हुआ,
सर्वदलीय खिलाफत से, मैदान-चौराहा सिपहसलार हुआ II
IV
बच्चे बूढ़े छात्रों ने, महानगरो ने हुंकार भरा,
उंच नीच, योगी भोगी, सबने संस्कार भरा I
गिनती को भली, मुस्लिमो ने इफ्तार करा,
दलितों ने राग छेरा, सर्वजन का खुमार चढ़ा II
डब्बावाला, रिक्शावाला सबको बुखार लगा,
अरुंधती और अरुणा बीच, अन्ना हज़ार बना I
साईकिल रैली, बैलून रैली, खूब अख़बार भरा,
माएवे-हाएवे, आरोप-प्रत्यारोप बेशुमार चढ़ा II
मध्यस्थ, मुख्या वार्ताकार, सबका अचार हुआ
बैनर पे बैनर, राम रावण सबका दुर्व्यवहार हुआ I
'आज फिर मिलेंगे' , पर प्रस्ताव निर्विचार हुआ,
मोबाइल में एसेमेस का भयानक अत्याचार हुआ II
ज्ञापन-विज्ञापन में प्रचारकों का निरोध बेकार बना,
'मुझे मौत की परवाह नहीं', अन्ना का ललकार बना I
जनता की ताकतों से आगाह सरकार लाचार बना,
अन्ना खा लो, अब जिद छोडो, सबका गुहार बना II
V
सांसदों का घेराव हो, संसद की घेराबंदी हो,
चाहे कितनी भी, जन मोर्चा की पाबन्दी हो I
सर पे लाठी, और सैकड़ों समर्थक बंदी हो,
जुबान पे इन्किलाब, और हौसला बुलंदी हो II
बिना झुके, बिन हटे, बिन समझौता, क्या कभी सुलह हुआ है ?
घोटाली आंकठ में डूबी सत्ता का, क्या कभी विलय हुआ है ?
नसों में खौलती जूनून से, क्या कभी तर्क पर विजय हुआ है ?
दिल में फितरत तो सही , क्या कभी इतिहास अजय हुआ है ?
VI
सवाल ढेरों हैं मन में, पर निस्फिक्र नवयुवको की भागीदारी को,
कार्यकर्त्ताओं की जिम्मेदारी को, अख़बारों की तरफदारी को ,
आंदोलोन की प्रतिनिधित्वता को, प्रतिक्रियाओं की विविधता को ,
सलाम करते है हम, अपने देश के संविधान की सर्वप्रेक्ष्यता को II
संदेह से घिरे हैं, पर दोस्तो के संग फिलहाल के वाद-विवाद को,
टीवी स्टूडियो में सजाये अभिवाद को, लोकतान्त्रिक प्रतिवाद को,
शांतिप्रेमी वीकेंड गांधीवाद को, हक के वास्ते गुर्राती जनउन्माद को,
सलाम करते है हम, आखिरी लम्हों के सार्थक संसदीय संवाद को II
VII
एक हीरो की महज़ तलाश थी, जिसने हक की मांग दोहराई है
चाहे कुछ भी हो, इतिहास गवाह है - अन्ना ने बिगुल बजाई है I
आशंका के दायरे में सही, एक सही - सच्ची उम्मीद जताई है,
विधि निर्माण में, आज व्यापक दायरे तलाशने की बारी आई है II
जरिया विवादास्पद सही, जनता-सरकार में सहमति बनाई है,
लोकपाल दुरुस्त और प्रभावी बने, यही जनसंघर्ष की लड़ाई है I
भ्रस्टाचार से कराहती जनता के, दशकों की चुप्पी की विदाई है
हो सकता है, राजघाट में कब्र तले, गाँधी जी ने ली जम्हाई है II
मानो ना मानो, आज फिर भारतीय लोकतंत्र ने ली अंगड़ाई है I
मानो ना मानो, आज फिर भारतीय लोकतंत्र ने ली अंगड़ाई है II
-------------------कौशल किशोर विद्यार्थी
Tuesday, January 05, 2010
Simply Rural
Monday, June 15, 2009
अपनी हिन्दी
रामायण पश्चात, संस्कृत ने भी बनवास लिया !
शुद्ध-विशुद्ध, सभ्यता - संस्कार - संस्कृति,
समन्वय-सविनय-सम्मान, विकराल विकृति !
अपनी प्यारी हिन्दी का भी बुरा हाल हुआ,
परसों नहीं, कल नहीं, ये तो फिलहाल हुआ !
सुनिये कभी गौर से, सरकारी हिन्दी में वार्तालाप,
तो लगे जैसे, इस SMS युग में 'रावण' का श्राप !
इधर TV set में, "Thanda मतलब Coca-Cola"
उधर अंग्रेजी में, चाय -चटनी -औ -टिक्का बोला !
आजकल College को कौन कहता महाविद्यालय है,
दो मिनट केवल हिन्दी, मानो चढना हिमालय है !
"Hungry क्या", या फिर, "ये दिल मांगे More",
हिन्दी अखबारों में, Tension-Pension का शोर !
क्या असली, क्या नकली, शब्द तो जरिया है,
भावनायें प्रधान, भाषा तो बहती दरिया है !
मत रोक, मत टोक इसे, हो जायेगी मलिन ये,
पत्थर हुये अगर बड़े तो, हो जायेगी कठिन ये !
धारायें कुछ पुराने खोने, तो कुछ नये ठहरने दे,
जो सरल है, सफल है, सजल है, वही रहने दे !
करती जो भी, समावेश अपने में, करने दे,
देसी-विदेसी - परदेसी, भरती है तो, भरने दे !
Hinglish कहें, हिंग्रेजी कहें, क्या फर्क पड़ता है
'अपनी हिन्दी' है, कहेंगे जैसे अपना दिल कहता है !
तु बस, बेढ़ंगी बेबाकी होने की वजह खोजना छोड़ दे,
'अपनी हिन्दी' तो समन्दर है, बूँदें जोड़ना छोड़ दे !!
--------------------------कौशल किशोर विद्यार्थी
Tuesday, July 15, 2008
Saturday, May 17, 2008
Sarfaroshi ki Tamanna
Sarfaroshi ki Tamanna-----Bismil Azimabadi
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में हैकरता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैवक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैहै लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैहाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैहम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैयूँ खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है.
दिल में तूफ़ानों कि टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में ह
Friday, May 16, 2008
A day with Butterflies
Tuesday, February 26, 2008
कविराज लालू
कवियों की वैसे तो कोई Girlfriend नहीं होती,
मगर कहानी शुरु हो जाये तो, कभी End होती ।
वाजपेयी जी कास एक बार चर्चा तो कर दिये होते,
बहन मायावती जी, क्या उनकी पलंग नही होती ॥
यह सुन, लालूजी की भी कवि बनने की तमन्ना जाग उठी,
हेमामालिनी-हेमामालिनी बड़बड़ा रहे थे कि राबड़ी भाग उठी ।
फिर क्या, सोचे राबड़ी कहीं किसी और से मिलने जा रही है,
वो बेलन संग लौटी तो, उनको लगा हेमामालिनी आ रही है ॥
पिटने के बाद कहने लगे, तुम्हें किसी से प्यार क्यूँ नही हो जाता,
मोदी को सोनिया पसंद नहीं, सो मैं तुम्हें ही उनके पास दे आता ।
मोदीजी क्या कम थे, बोले- 'जयललिता हमको रोज भोज पर बुलाती',
'मेरा तो मुसकुराना बाकी है, वरना तमिलनाडु दहेज मे मिल जाती '॥
निराश हो सोचे, गर कहीं राबड़ी-औ-वाजपेयी का चक्कर चल जायेगा,
एक का घुटना टूटा ही रहता है, दूसरे को मालिश-ड्यूटी मिल जायेगा ।
ये दो बेरोजगार जब साथ होंगे, तो पक्का मस्त-मस्त गुल खिलायेंगे,
और फिर कुवारों की लिस्ट मे, केवल अपने कलाम जी रह जायेंगे ॥
और, उधर धमेंद्र जी ज्यादा हल्ला किये तो, उनको पशु चारा खिलायेंगे,
फिर भी नही माने तो, सन्यासन उमा संग उनके सात फेरे लगवायेंगे ।
'कमल' के इन दोनो फूलों से, बिहार में ढ़ेरों रोज 'लालटेन' जलवायेंगे,
और 'गरीब रथ' मे Free Ticket पे, रेलवे Honeymoon मनवायेंगे ॥
फिर लालुजी, हेमामालिनी संग अपना ब्याह रचायेंगे,
और लालु नही, ललुवा नही, कविराज लालु कहलायेंगे ॥॥
Sunday, February 03, 2008
तू
तू ही सत्य, तू ही त्याग, तुझसे ही सम्मान है,
तू मेरा सर्वस्व है, तुझसे ही मेरा जहान है ।
तू मेरे स्वप्न में है, तू ही मेरी समृद्धि में,
तू मेरे प्रयत्न में है, तू ही मेरी सिद्धि में,
मेरी बंदिश मे तू,
मेरे हर लब्ज, हर कशिश मे तू ।
मेरा हर कजरा तेरे लिये, मेरा हर गजरा तेरे लिये,
मेरा लम्हा गुजरा तेरे लिये, मेरा लम्हा ठहरा तेरे लिये,
मेरे जीने की आदत तू,
मेरी इबारत तू, मेरी इबादत तू ।
ना कोई उद्देश्य मेरा, ना ही मेरी परिभाषा है,
तू ही मेरी जागृति, तू ही मेरी जिजीविषा है,
मेरी प्रकृति में तू, मेरी प्रवृत्ति में तू,
स्नेह की सलज्जा वृत्ति में तू ।
तू ही मेरा उपनाम है, तू ही मेरा सर्वनाम है,
मेरी हर सिफत तू, हर उल्फत मे तेरा नाम है,
हर साज, हर नगमों मे तुम ही तुम हो,
मेरे हर हसीन महकमों में तुम ही तुम हो ।
भोर की परछाई में तू, दुपहरी की तन्हाई में तू,
शाम की शहनाई मे तू, निशा की गहराई में तू,
तू अथाह आकाश है,
मेरे लिये तू ही प्रकाश है ।
मेरी कविता है तू, हर प्रेरणा तुझसे, हर अलंकार तेरे लिये,
मेरे लेखनी की सरिता तू, मन का हर रस, श्रृंगार तेरे लिये,
मेरी अर्चना तू, मेरी वंदना तू,
हर स्तुति तू, हर अनुभुति तू ।
तुम हो तो हँसी है, खुशी है, तुम हो तो अपनत्व है,
जीवन में ताजगी, उन्मादगी और मीठा ममत्व है,
मेरी तपन में तू, मेरी लगन में तू,
चहकते जहन में तू, महकते गगन में तू ।
मेरी उम्मीद, मेरे विश्वास, सब पर तेरा वर्चस्व है,
मेरे कर्म मे तू, मेरे मर्म मे तू, तू ही मेरा सर्वस्व है।
मेरे सच मे तू, मेरे झूठ में तू, तू ही मेरा सर्वस्व है,
तू असीम है, तू अप्रतिम है, तू ही मेरा सर्वस्व है ।।
Saturday, January 19, 2008
रहीम के दोहे
छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥1॥
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥2॥
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥3॥
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥4॥
जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥5॥
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥6॥
आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥7॥
खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय॥8॥
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥9॥
जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥10॥
जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥11॥
रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥12॥
बड़े काम ओछो करै, तो न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय॥13॥
माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥14॥
एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥15॥
रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥16॥
रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥17॥
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥18॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब्ब॥19॥
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय॥20॥
निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाय॥21॥
रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥22॥
रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥23॥
बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥24॥
मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥25॥
दोनों रहिमन एक से, जब लौं बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, ऋतु वसंत कै माहि॥26॥
रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥27॥
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥28॥
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥29॥
वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥30॥
-रहीम
सतपुड़ा के घने जंगल
This Poem -'Satpura ke Ghane Jungle', written by Bhawani Prasad Mishr, was one of my most favourite one during my school days. I derive lots of inspiration from Bhwani Ji's style of writing.
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल।
झाड़ ऊँचे और नीचे
चुप खड़े हैं आँख मींचे,
घास चुप है, काश चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है;
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते, अनमने जंगल!
सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य को पथ ढँक रहे-से,
पंक दल में पले पत्ते,
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनौने-घने जंगल,
नीद में डूबे हुए-से
ऊँघते, अनमने जंगल!
अटपटी उलझी लताएँ,
डालियों को खींच खाएँ,
पैरों को पकड़ें अचानक,
प्राण को कसलें कपाएँ,
साँप-सी काली लताएँ
बला की पाली लताएँ
लताओं के बने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।
मकिड़यों के जाल मुँह पर,
और सिर के बाल मुँह पर,
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात झंझा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।
अजगरों से भरे जंगल
अगम, गति से परे जंगल,
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े-छोटे बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कंप से कनकने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल।
इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर,
पाल कर निश्चिंत बैठे,
विजन वन के बीच बैठे,
झोंपड़ी पर फूस डाले
गोंड तगड़े और काले
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके ढोल इनके।
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल
जागते अँगडाइयों में
खोह खडडों खाइयों में
घास पागल, काश पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल,
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर!
क्षितिज तक फैला हुआ-सा
मृत्यु तक मैला हुआ-सा,
क्षुब्ध काली लहर वाला,
मथित, उत्थित जहर वाला
मेरू वाला, शेष वाला,
शंभु और सुरेश वाला,
एक सागर जानते हो?
उसे कैसे मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।
धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतरकर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी निझर्र और नाले ,
इन वनों ने गोद पाले,
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फूल फिलयाँ,
खिल रहीं अज्ञात किलयाँ,
हिरत दूवार्, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय,
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल|
- भवानी प्रसाद मिश्र
Thursday, January 17, 2008
मेरा गाँव मेरा देश
Thursday, November 22, 2007
Beautiful Tanzania
Life in Tanzania
Once in Zanzibar
Tuesday, November 06, 2007
तुम
मासूम हो, पगली हो, मगर बच्ची नहीं हो,
लड़ती हो, झगड़ती हो, पर सच्ची नहीं हो,
दिल से शैतान हो, पर झूठी नहीं हो,
खुद से परेशान हो, पर रूठी नहीं हो
गर लगता तुझे, ये मेरी गलतफहमी है,
तो तुझे क्या सोचना, तु क्यूँ सहमी है
तुम सच्ची हो, सचमुच की अच्छी हो,
क्यूँ कहती हो कि, तुम अच्छी नहीं हो
जो कहना है मुझे, बस तुम कह लेने दो,
जो धुंध है मन में, उसमें ही रह लेने दो,
खशियों मे तेरी, हँसी अपनी सी लेने दो,
मुझे मेरी गलतफहमियों मे जी लेने दो
इक पल सही, हर दिन आगोश मे सो लेने दो,
दिल जो करे रोने को, साथ अपने रो लेने दो,
तेरी चंचलता की खशबू में, मुझको खो लेने दो ,
तेरी बातों की जादू में, खुद को भिगो लेने दो
तुम, मुझे मेरी गलतफहमियों मे जी लेने दो,
दो चार घूंट संग, मुस्कुराहटों के पी लेने दो
तेरी ताजगी पे चाहे तो, रोशनी को भी निखर लेने दो,
अपनी सादगी से आज तू, चाँदनी को भी सँवर लेने दो,
गर झुक जाये फलक तो, सितारों को भी बह लेने दो,
तु इतनी प्यारी है, मुझे ये चंदा को भी कह लेने दो
जो कहना है मुझे, बस तुम कह लेने दो,
मुझे मेरी गलतफहमियों मे रह लेने दो
Saturday, September 29, 2007
A Day with Maasai People
Thursday, July 26, 2007
Rural India
Thursday, July 19, 2007
The Chewing-Gum Generation
The time has changed very fast in last decade in
They are very assertive about their choices. They are fearless about their aspirations. They think beyond boundaries. For them, no constraints can be justified. They have no time to think except their fun and dreams. They have no time to learn how to handle shattered dreams. They belong to the generation of opportunities, possibilities and aspirations, not of constraints. I say this generation –‘The Chewing-Gum Generation’.






















