तुम रोज कहती हो, तुम अच्छी नहीं हो,
मासूम हो, पगली हो, मगर बच्ची नहीं हो,
लड़ती हो, झगड़ती हो, पर सच्ची नहीं हो,
दिल से शैतान हो, पर झूठी नहीं हो,
खुद से परेशान हो, पर रूठी नहीं हो
गर लगता तुझे, ये मेरी गलतफहमी है,
तो तुझे क्या सोचना, तु क्यूँ सहमी है
तुम सच्ची हो, सचमुच की अच्छी हो,
क्यूँ कहती हो कि, तुम अच्छी नहीं हो
जो कहना है मुझे, बस तुम कह लेने दो,
जो धुंध है मन में, उसमें ही रह लेने दो,
खशियों मे तेरी, हँसी अपनी सी लेने दो,
मुझे मेरी गलतफहमियों मे जी लेने दो
इक पल सही, हर दिन आगोश मे सो लेने दो,
दिल जो करे रोने को, साथ अपने रो लेने दो,
तेरी चंचलता की खशबू में, मुझको खो लेने दो ,
तेरी बातों की जादू में, खुद को भिगो लेने दो
तुम, मुझे मेरी गलतफहमियों मे जी लेने दो,
दो चार घूंट संग, मुस्कुराहटों के पी लेने दो
तेरी ताजगी पे चाहे तो, रोशनी को भी निखर लेने दो,
अपनी सादगी से आज तू, चाँदनी को भी सँवर लेने दो,
गर झुक जाये फलक तो, सितारों को भी बह लेने दो,
तु इतनी प्यारी है, मुझे ये चंदा को भी कह लेने दो
जो कहना है मुझे, बस तुम कह लेने दो,
मुझे मेरी गलतफहमियों मे रह लेने दो
Tuesday, November 06, 2007
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


1 comments:
kavita bahut badhiya likhte ho. kahi ye tumhare sapno ki raani to nahi?
Post a Comment