I
कभी लगता ही नहीं तू , शायद अगले साल भी ख़तम होगी
कोई दुखी सचमुच तो, टेबल, नोटबुक और मेरी कलम होगी
माथा घिस घिस तुझसे इश्क लगा बैठा, मानो फूटी करम होगी
हाय रे PhD , तुझे बताना था, तू सच्ची बेवफा सनम होगी II
तुझसे चिपक जाने से कोई विद्वान हो जाये, ये झूठी भरम होगी,
तुझसे बरसों से जो इकरार करे, कभी तीखी, तो कभी नरम होगी,
दोस्तों से तकरार तो, प्यार से इंकार भी तेरी खोखली धरम होगी,
हाय रे PhD , मुझे अंदाजा ना था, जो तू इतनी बेशरम होगी II
तू इतना डरा धमका मत, तू मुझे निगल सकती ये तेरी वहम होगी,
आधी गपट ली तेरी रोटी, रिजल्ट- अनालिसिस तेरी शरम होगी,
शुकून तो तब होगा मुझे, जब तेरे पन्नों से मेरी बिस्तर गरम होगी,
हाय रे PhD , याद रख, कबर पे तेरे एक दिन 'डॉक्टर' जनम होगी II
II
तेरी फितरत का मंजर इतना ख़राब, तू मुझे गले लगा नहीं पाती,
तेरी आरज़ू में खोट है, तू किसी को खुशियों से सजा नहीं पाती,
तू कमीनी, तू निर्लज्ज, तू निर्मम, तू ज़ालिम, तुझे दया नहीं आती,
हाय रे PhD , रात भर छेरती मुझे, क्या तुझे हया नहीं आती II
डिपार्टमेंट के रास्तों की, रोजाना हसीं तस्वीर सजायी नहीं जाती
सुपरवायजर के कमेंट्स की, पुलिंदो से तकदीर बनायीं नहीं जाती
लाइब्रेरी के सूखे दीवारों पर, अब और निशान खुदायी नहीं जाती
हाय रे PhD, ख्याल कर, तेरी और मेल-मालिश करायी नहीं जाती II
नाम में लगा है 'विद्यार्थी', चैन से खुले आम कभी यु रोयी नहीं जाती ,
बीच मजधार में छोड़ जाएँ कहाँ, मलिन पापी पांव धोयी नहीं जाती,
तुने इतना दर्द किया कि, कान्फ्रेन्स में भी अब दिल खोयी नहीं जाती
हाय रे PhD, पेपर्स कि बारिश में तुझे धकेल भिगोयी नहीं जाती II
III
जान लेगी क्या, तू इतना गुनाह तो मत कर,
माना तूफान बाकी है, तू आगाह तो मत कर,
हर बैठक में, तू जोखिम अथाह तो मत कर,
मुझे फेल करने की, तू अब सलाह तो मत कर,
जी लेने दे मुझे, निराशा से निकाह तो मत कर,
तू खट्टी है, बेवजह नमक से विवाह तो मत कर,
तेरे होठों में रस नहीं, यु गुमराह तो मत कर ,
ढेरों संग हमबिस्तर हुई, मुझे हताह तो मत कर
हाय रे PhD, तू मुझे इतना तो तबाह मत कर I
हाय रे PhD, तू मुझे इतना तो तबाह मत कर II
---------------------कौशल किशोर विद्यार्थी
Friday, September 23, 2011
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1 comments:
Jaan legi kya..... Phd - Kavita majedar lagi.
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